उम्मीद का अंकुर | ऊँट के मुँह में जीरा

बुंदेलखंड के परसईपुर गाँव की हवा अब कुछ बदलने लगी थी। हरिशंकर का जीवन, जो एक समय धोखे और पछतावे से भरा था, अब भरोसे और सेवा की ओर मुड़ चुका था। गाँव के लोग जो कभी उससे आँख मिलाना भी नहीं चाहते थे, अब उसे “शंकर भइया” कहकर पुकारने लगे थे। गाँव के बच्चे उसे घेर लेते, और वह कभी उन्हें खेत की मिट्टी से खेलना सिखाता, तो कभी पुराने किस्से सुनाया करता।
लेकिन एक दिन पंचायत ने एक नई जिम्मेदारी उसे सौंप दी — गाँव के जर्जर स्कूल को फिर से जीवित करना।
“तूने जब बंजर खेत को हरियाली दी, तो अब गाँव के बच्चों को भविष्य क्यों नहीं दे सकता?”
— सरपंच की बातों में सच्चाई भी थी और चुनौती भी।
टूटा हुआ स्कूल, टूटी हुई उम्मीदें
हरिशंकर जब पहली बार स्कूल पहुँचा, तो उसका दिल बैठ गया। दीवारें टपकी हुईं, खिड़कियाँ टूटीं, फर्श पर गोबर और धूल का साम्राज्य। कक्षा के नाम पर चार दीवारें थीं और शिक्षा के नाम पर सिर्फ़ एक बूढ़े मास्टरजी जो खुद इतने हताश थे कि बच्चों के आने का इंतज़ार भी छोड़ चुके थे।
बच्चे…? वे कहाँ थे? कोई खेतों में काम कर रहा था, कोई माँ-बाप के साथ मवेशियों को चरा रहा था।
हरिशंकर की आँखों में नमी थी।
“इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी, और मेरे पास है क्या? न पैसा, न साधन। बस एक सपना… ये तो जैसे ऊँट के मुँह में जीरा है।”
पहली ईंट
हरिशंकर ने तय किया — कोई साथ दे न दे, वह अकेला शुरुआत करेगा।
उसने खुद अपने घर से पुराने फावड़े, बाल्टी, और एक टूटी खाट निकाली। स्कूल की सफाई खुद शुरू की। झाड़ू लगाई, दीवारों पर चुना पोता, छत की टपकती टीन हटाकर प्लास्टिक की चादर लगा दी।
बच्चे चुपचाप दूर से देख रहे थे। एक दिन छोटा मुन्ना उसके पास आया और बोला, “शंकर चाचा, मैं आपकी मदद करूँ?”
हरिशंकर की आँखें भर आईं — “मुन्ना, तू ही तो मेरे इस सपने की पहली ईंट है।”
धीरे-धीरे पाँच, फिर दस, फिर पंद्रह बच्चे आ गए। सब मिलकर स्कूल की सफाई करने लगे, दीवारों पर रंग भरने लगे, फूल-पत्तियों की चित्रकारी करने लगे।
ऊँट के मुँह में जीरा
लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं हुई।
अब ज़रूरत थी किताबों की, कुर्सियों की, ब्लैकबोर्ड की, मास्टरों की तनख्वाह की।
पंचायत की ओर से एक महीने में ₹2000 की मदद मिली — “सिर्फ़ औपचारिकता निभाने को।”
हरिशंकर ने रुपए गिने, फिर हँस दिया — “भूखे ऊँट को एक जीरा मिला है बस।”
कई लोगों ने मज़ाक उड़ाया — “शंकर भइया, किताबें छपवा रहे हो या रामराज्य लाना चाह रहे हो?”
लेकिन कुछ मज़ाक उड़ाने वालों में से ही कुछ चुपचाप रात को एक-एक ईंट दे जाते, कोई दो ब्रश छोड़ जाता, कोई पुरानी स्लेट।
उम्मीद का सोशल मंच
हरिशंकर को एक विचार आया — उसने पास के शहर में जाकर एक कंप्यूटर सेंटर से मदद माँगी। वहाँ के लड़कों ने उसकी बात सुनी और एक छोटा-सा वीडियो बना डाला जिसमें स्कूल के हालात, बच्चों की हालत और हरिशंकर की मेहनत दिखाई गई।
वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
“बुंदेलखंड का एक किसान शिक्षा की खेती कर रहा है।” — ऐसे हेडलाइन के साथ अखबारों और न्यूज पोर्टल्स में ख़बर छपने लगी।
दो दिन में ही दिल्ली से एक NGO ने संपर्क किया — “हम 100 किताबें भेज सकते हैं।”
फिर किसी कॉलेज स्टूडेंट ग्रुप ने वॉल पेंटिंग और कक्षाओं के लिए चार पुरानी बेंच भिजवा दी।
अब गाँव का वही टूटा स्कूल उम्मीद का अंकुर बन चुका था।
मास्टरजी का बदला हुआ स्वर
पुराने मास्टरजी — जो सालों से थके हुए लगते थे — अब नए बच्चों को देखकर रोज़ नए पाठ बना रहे थे।
उनकी आँखों में अब चश्मा नहीं, चमक थी।
“शंकर, तूने इस स्कूल को नहीं, मुझे ज़िंदा किया है।” — उन्होंने एक दिन भावुक होकर कहा।
गाँव का मेला
हरिशंकर ने गाँव में एक मेला रखा — ‘ज्ञान मेला’।
बच्चों ने नाटक खेले, कविताएँ सुनाईं, दीवारों पर अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई।
मेले में आये पत्रकार ने पूछा, “इतना सब करके आपको क्या मिला, हरिशंकर जी?”
हरिशंकर ने मुस्कराते हुए जवाब दिया —
“पहले मैं बीज बेचता था, अब मैं भविष्य बो रहा हूँ।”
सीख:
“ऊँट के मुँह में जीरा” चाहे कितना भी छोटा हो, अगर वो उम्मीद से भरा हो — तो ऊँट भी झुककर चखता है।
हरिशंकर के पास साधन नहीं थे, लेकिन उसका संकल्प साधनों से बड़ा था। छोटे-छोटे प्रयासों ने मिलकर एक बड़ी तस्वीर बनाई।
अगली कड़ी का संकेत:
जब नाम होता है, तो काम को देखने वाले भी बहुत होते हैं। अब हरिशंकर के गाँव में चुनाव की बयार है — और कुछ लोग उसके नाम का इस्तेमाल करने की फिराक़ में हैं।
जब किसी के अच्छे काम पर दूसरा अपना नाम चिपकाए — तब कहते हैं:
“नाच न आवे आँगन टेढ़ा।”
क्या हरिशंकर राजनीति के इस खेल को समझ पाएगा?
क्या सेवा की ज़मीन पर सत्ता की घास उगेगी?
जानिए अगली कहानी में…
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