छोटे शहर की बड़ी कहानी: एक चायवाले की ज़ुबानी

लेखक: Kahaniwala

1. स्टेशन रोड का कोना

शहर का नाम भले ही छोटा हो – मधुपुर, लेकिन इसकी हर गली में हज़ार कहानियाँ दबी हुई हैं। स्टेशन रोड पर एक मोड़ है, जहाँ हर सुबह-सुबह एक बूढ़ा आदमी तांबे के केतली में चाय पकाता है। नाम है — बद्री चायवाला। उम्र करीब 65 के पार, पर आंखों में अब भी एक चमक बची हुई है।

“बेटा, चाय में अगर उबाल ठीक से ना आए, तो न स्वाद आएगा, न बात बनेगी,” वो मुस्कुराकर हर ग्राहक से यही कहता है।

पर लोग नहीं जानते कि उसकी मुस्कान के पीछे एक ज़माने की एक अधूरी कहानी छिपी है।

2. एक सपना जो स्टेशन से शुरू हुआ था

बद्री बचपन में स्टेशन के ठीक सामने वाले स्कूल में पढ़ा करता था। उसके पिता भी स्टेशन पर कुली थे। घर में गरीबी थी, पर सपनों की कोई कमी नहीं। बद्री चाहता था कि वो रेलगाड़ी चलाए — इंजन में बैठे, सीटी दे, और दूर-दूर तक सफ़र करे।

एक बार स्कूल में जब पूछा गया — “तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?”
तो बद्री ने सीना तानकर कहा — “मैं ड्राइवर बनूंगा! इंजन वाला!”

बच्चे हँस पड़े, मास्टर भी मुस्कुरा दिया, पर बद्री की आंखों में सचमुच का सपना था।

3. ज़िंदगी की पहली पटरी से फिसलना

सपनों की रेल जब तेज़ चल रही थी, तभी अचानक एक हादसा हो गया। उसके पिता की प्लेटफॉर्म पर गिरकर मौत हो गई। पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उसके सिर पर आ गई।

तभी मां ने कहा — “अब नौकरी-पढ़ाई छोड़, कुछ काम कर।”

बद्री ने पढ़ाई छोड़ दी। स्टेशन के बाहर एक चायवाले के पास काम पकड़ लिया — केतली धोता, कुल्हड़ सजाता, और धीरे-धीरे चाय बनाना सीख गया।

“सपना भूल जा, बद्री,” कई बार खुद से कहा — “हमारे जैसे लोग सपने नहीं देखते।”

4. किस्मत का पहला कुल्हड़

कई साल बीते। अब बद्री खुद चाय का ठेला लगाने लगा। उसका नाम स्टेशन के आसपास के लोगों में मशहूर हो गया — “बद्री की कटिंग चाय”

एक दिन, स्टेशन पर एक बुज़ुर्ग सज्जन आए। साफ सुथरे कपड़े, माथे पर गोल चश्मा, और साथ में एक लड़का। वो चाय पीते-पीते बद्री से बोले:

“तुम्हारी चाय में स्वाद है, और बातें भी दिल से करते हो। कभी सोचा है, कुछ बड़ा करने का?”

बद्री हँस दिया — “अब उम्र ही क्या बची है, साहब?”

“उम्र नहीं, सोच मायने रखती है,” वो बोले, “मेरे पास एक पुराना रेलवे इंजन है — कबाड़ में पड़ा है। अगर चाहो तो उसे चाय कैफ़े में बदल सकते हो।”

बद्री हक्का-बक्का रह गया।

5. इंजन में फिर से जान आई

कुछ हफ्तों बाद, स्टेशन के एक किनारे कबाड़ पड़े इंजन में सफ़ाई शुरू हुई। गाँव के लड़के, पुराने साथी, और स्टेशन के कुली भी मदद को आए। कई दिन तक पसीना बहा।

फिर एक दिन, “बद्री टी स्टेशन” नाम से स्टेशन पर पहला चाय कैफे खुला — एक असली रेलवे इंजन के भीतर!

जहाँ पहले भाप निकलती थी, अब वहां अदरक की चाय की महक उड़ती थी। पहले जहाँ ड्राइवर बैठता था, अब वहीं बद्री बैठता है — कैश काउंटर पर, मुस्कराते हुए।

6. आखिरी मोड़, पहली मंज़िल

आज बद्री का नाम इंटरनेट पर है। यूट्यूबर वीडियो बनाते हैं, ट्रैवलर ब्लॉग्स में उसका नाम आता है। लेकिन वो खुद अब भी वही कुल्हड़ उठाता है, और हर ग्राहक से पूछता है:

“कटिंग दूं या फुल?”

पर जो बात वो सबको नहीं बताता, वो ये है —
उसने कभी रेल नहीं चलाई,
पर एक पुरानी रेल से सपनों की ट्रेन ज़रूर बना ली।

7. एक चायवाले की ज़ुबानी…

“सपना अगर छोटा हो, तो हालात उसे निगल जाते हैं।
पर अगर सपना बड़ा हो, तो हालात को भी पिघला देता है।”

आपसे सवाल:
क्या आपने भी कभी कोई सपना बीच में छोड़ दिया था?
या क्या आपको भी कभी लगा था कि उम्र, हालात या गरीबी ने आपको रोक दिया?

तो बद्री की कहानी याद रखिए — सपने देर से पूरे होते हैं, लेकिन अगर दिल में ज़िंदा रहें, तो कभी मरते नहीं।

~ Kahaniwala
जहाँ कहानियाँ सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं — महसूस की जाती हैं।

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