बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद

परसाईपुर गांव में अब बसंती हवा बह रही थी। खेतों में गेहूं की बालियाँ झूम रही थीं और आमों में बौर आ चुके थे। गाँव का हर कोना हरियाली से लहराता था, मगर Harishankar के मन का मौसम थोड़ा भारी था। पिछली बार मंडी में सरसों के सौदे में घाटा हो गया था और गांव के कुछ लोग तंज कसने लगे थे — “कभी-कभी किस्मत भी बटेर बन के बैठती है, पर बंदा अगर ऊँट के मुँह में जीरा भर दे, तो क्या हो?”

एक शाम, जब हरिशंकर अपने खलिहान में अकेला बैठा गन्ने की छल्ली चबा रहा था, तभी उसका पुराना यार — ध्यानचंद — गांव लौटा। शहर से पढ़ाई करके लौटा ध्यानचंद अब बड़ा समझदार और नया-नया टेक्नोलॉजी वाला हो गया था। मोबाइल पर अंगूठा घुमाते हुए उसने कहा —
“Harishankar, गाँव में अब बदलने का समय है। अब खेती भी स्मार्ट हो गई है। QR code से ट्रैकिंग होती है, organic farming का जमाना है, और ये जो तुम हल-बैल लेकर करते हो, वो तो अब म्यूज़ियम में दिखाया जाता है।”

Harishankar ने एक लंबी साँस ली और बोला —
“भाई, हम तो मिट्टी के आदमी हैं। जब धरती माँ से बात होती है न, तो हमें signal की ज़रूरत नहीं पड़ती।”

ध्यानचंद मुस्कुराया और बोला —
“तू तो वही पुरानी घिसी-पिटी सोच में फँसा है। आर्गेनिक सब्ज़ी की डिमांड बहुत है, दिल्ली-मुंबई में 100 रुपये किलो में पालक बिकता है, और तू 5 रुपये में खेत से तुड़वा देता है।“

Harishankar को बात तो समझ में आई, मगर उसे यकीन नहीं हुआ। वो बोला,
“बम्बई-दिल्ली का तो ठीक है, पर क्या हमारा परसाईपुर भी इतने बड़े सपने देख सकता है?”

ध्यानचंद ने बिना जवाब दिए अगले दिन Harishankar को शहर चलने को कहा। दो दिन बाद वे दोनों एक पास के शहर में एक ‘एग्रीटेक एग्ज़िबिशन’ में पहुँचे। वहाँ ड्रोन से कीटनाशक छिड़काव, स्मार्ट सेंसर वाले खेत, मोबाइल ऐप्स से सिंचाई कंट्रोल — ये सब देखकर Harishankar की आँखें फटी रह गईं।
उसने धीमे से कहा —
“इन्हें खेती आती है या जादूगरी?”

ध्यानचंद ने हँसते हुए कहा —
“भाई, जादू नहीं, ज्ञान है। और ज्ञान की कद्र करनी चाहिए। तू समझेगा धीरे-धीरे।”

पर Harishankar के दिल में कहीं ना कहीं खटका था। उसे लगता था कि ये सब दिखावा है, असली खेती तो खेतों में पसीना बहाने से होती है। exhibition से लौटकर उसने दो दिनों तक ध्यानचंद की बातों पर खूब सोचा।

कुछ हफ्ते बाद गांव में कृषि विभाग की तरफ से एक organic farming training आई। ध्यानचंद ने Harishankar को जबरदस्ती भेजा। वहाँ बहुत सारे लोग थे — कुछ जवान, कुछ बूढ़े, और कुछ बिल्कुल नये-नवेले इंजीनियर जैसे।
ट्रेनर ने स्मार्ट खेती के फायदे, soil testing, crop rotation, और compost से जुड़ी बातें कहीं। पर Harishankar bored हो गया।
वो बोला —
“ये सब अंग्रेज़ी ज्ञान है, हमारी देसी गाय का गोबर ही असली tonic है।”

लोग हँसने लगे। Trainer चुप हो गया।
Harishankar उठकर बाहर आ गया और गेट पर खड़े पानीवाले से बोला —
“काहे का organic? बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!”

कुछ ही दिनों में गाँव के चार लड़कों ने शहर की एक कंपनी से समझौता किया और एक Mini Organic Farming Cluster शुरू किया। हर खेत में QR code, traceability और organic labels लगने लगे। उन्होंने Harishankar को भी ऑफर दिया, लेकिन उसने मना कर दिया —
“बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे? हम तो सीधी खेती वाले हैं।”

कुछ ही महीनों में उन लड़कों का पहला organic lot मुंबई गया और चार गुना दाम में बिका। अब गांव में उनकी मिसाल दी जाने लगी। गाँव की सरपंचाइन रेखा देवी ने पंचायत में उनका सम्मान करवाया और पूरे गाँव में organic farming plan की शुरुआत कर दी।

अब बात-बात पर हर कोई Harishankar को कहता —
“तू तो experience वाला किसान है, पर तेरी सोच पुराने टाइम में फँसी है।”

Harishankar मुस्कुराता और बहाना बना देता।
“भाई, मेरे पास टाइम नहीं है इस दिखावे के लिए। असली स्वाद मिट्टी से आता है, कम्प्यूटर से नहीं।”

मगर अब उसके खेत की सब्ज़ियाँ सस्ती बिकने लगीं। वहीं सामने वाले खेत के QR code वाली सब्ज़ियाँ महंगे रेट पर बिक रही थीं।
एक दिन उसका 14 साल का बेटा रोहित स्कूल से लौटा और बोला —
“बाबा, कल एक सर आया था — organic farming पर lecture दिया। मैं बोला, मेरे बाबा सब जानते हैं। उन्होंने कहा — अच्छा, फिर वो अभी तक traditional farming ही क्यों कर रहे हैं?”

ये सुनकर Harishankar को लगा जैसे किसी ने उसकी छाती में कुछ चुभा दिया हो।
उसे पहली बार अपनी सोच पर शंका हुई।

अगले दिन भोर में वो खुद ध्यानचंद के पास गया और बोला —
“मुझे भी सिखा दे, कैसे QR code लगाते हैं? कैसे पता चलता है मिट्टी में क्या कमी है?”

ध्यानचंद मुस्कुराया, “अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे?”

Harishankar ने झेंपते हुए कहा,
“हाँ भाई, अब समझ में आ गया कि बंदर अगर अदरक नहीं समझता, तो गलती अदरक की नहीं।”

धीरे-धीरे Harishankar ने भी जैविक खाद बनाना सीखा, मिट्टी का टेस्ट कराया, और crop rotation की योजना बनाई। पहले बार की फसल में कुछ खास लाभ नहीं हुआ, लेकिन जैसे-जैसे उसने समझना शुरू किया, उसकी पैदावार भी सुधरी और बाजार में मांग भी बढ़ी।

अब गाँव में हर किसान उसे “Organic Guru” कहने लगा।

एक दिन, पंचायत भवन में गाँव के युवाओं की मीटिंग में Harishankar ने मंच पर खड़े होकर कहा —
“हमारी गलती यही है कि हम नई चीज़ों को देखकर डर जाते हैं। पहले मुझे भी लगा कि ये सब दिखावा है। पर असल में ये ज्ञान है। और अगर हम ज्ञान को नहीं समझेंगे, तो हम वही बंदर बन जाएंगे जो अदरक की कद्र नहीं करता।”

जो बदलाव से डरता है, वो विकास से चूक जाता है। और जो समझता है कि अदरक का स्वाद सिर्फ तीखा होता है, वो उसकी असल मिठास कभी जान ही नहीं सकता। — बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद।

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