बूढ़ी अम्मा की आख़िरी चिट्ठी – एक अधूरी कहानी

गाँव के कोने में बनी पुरानी सी ईंटों वाली कोठरी में रहती थीं श्यामा अम्मा। सफेद झक्क बाल, काँपते हुए हाथ, और आँखों में इंतज़ार की नमी। कोई आता-जाता नहीं था, पर उनकी दिनचर्या कभी नहीं बदली। हर सुबह पूजा के बाद वो बैठतीं, एक पेन और पुराना खत निकालतीं — और लिखना शुरू कर देतीं।
हर दिन एक चिट्ठी… पर किसके लिए?
ये चिट्ठियाँ थीं उनके बेटे मनोज के नाम — जो पिछले दस सालों से शहर में बस चुका था, माँ को पीछे छोड़कर। वो कभी लौटकर नहीं आया, न ही चिट्ठियाँ भेजीं। लेकिन श्यामा अम्मा का प्यार कभी कम नहीं हुआ।
“बेटा, आज मैंने खिचड़ी बनाई थी — तू कहता था ना कि तुझे मेरी खिचड़ी बहुत पसंद है। बस, आज भी तेरी याद में बना ली…”
ऐसी ही बातें होती थीं हर चिट्ठी में। प्यार, ममता, शिकायतें… लेकिन कभी गुस्सा नहीं। वो चिट्ठियाँ कभी पोस्ट नहीं हुईं — बस संदूक में जमा होती गईं।
और फिर एक दिन…
गाँव में खबर फैली — श्यामा अम्मा अब नहीं रहीं। अंतिम संस्कार के बाद पड़ोसी रामू काका ने उनका कमरा साफ करते समय वो संदूक खोला। उसमें थे 362 चिट्ठियाँ — हर दिन एक!
रामू काका ने वो चिट्ठियाँ मनोज तक पहुँचाई। पहले तो वो नाराज़ हुआ, बोला, “अब इनसे क्या फ़ायदा?” पर जैसे ही उसने आख़िरी चिट्ठी खोली, वो चौंक गया।
“अगर तुझे मेरी याद तब आए, जब मैं न रहूँ… तो बस एक बार आकर मेरा आँगन देख लेना। वहाँ आज भी तेरे पैरों की छाप है।”
मनोज लौट आया
वो दिन और आज का दिन — मनोज हर साल माँ की बरसी पर गाँव आता है। आँगन में बैठता है, खिचड़ी बनाता है, और एक चिट्ठी खुद माँ के नाम लिखता है। शायद अब उसकी आत्मा चैन पा चुकी है… पर श्यामा अम्मा की चिट्ठियाँ आज भी वहाँ रखी हैं — एक माँ की अधूरी मोहब्बत का सबूत।