किस्मत की बटेर | अंधे के हाथ बटेर लगना

कहानी: किस्मत की बटेर
गाँव की पंचायत में जब हरिशंकर ने झुककर माफ़ी माँगी थी, तो न सिर्फ़ उसका सिर, बल्कि उसकी आत्मा भी झुक गई थी। गाँववालों की आँखों में सिर्फ़ क्रोध नहीं था, उसमें विश्वास टूटने का दर्द भी था।
उस रात घर लौटते हुए हरिशंकर की आँखों में नींद नहीं, आँसू थे।
पत्नी विमला ने खामोशी से खाना परोसा — सूखी रोटी और उबली दाल। बेटा नन्हे को देखकर वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन बच्चा उससे आँखें चुरा रहा था।
“शायद मैं अब सिर्फ़ उसके लिए ‘पिता’ नहीं, ‘गुनहगार’ बन गया हूँ,” उसने मन में सोचा।
एक अजनबी सहारा: बाबा केदार
तीन दिन तक वह घर में ही छुपा रहा। बाहर निकलने की हिम्मत नहीं थी। तभी चौथे दिन, दरवाज़े पर एक धीमी दस्तक हुई।
बाहर गाँव का सबसे बूढ़ा किसान — बाबा केदार खड़ा था। गठरी-सा झुका शरीर, सफ़ेद दाढ़ी, लकड़ी की छड़ी और आँखों में एक विशेष प्रकार की चमक — वह जिसे लोग गाँव का “चलता-फिरता अनुभव” कहते थे।
बाबा बोले,“हरिशंकर,” “ग़लती हर इंसान से होती है। लेकिन सुधार करने की ताकत हर किसी में नहीं होती। क्या तुम खुद को सुधारना चाहते हो?”
हरिशंकर ने आँखों में आँसू भरकर सिर हिलाया।
“तो कल सुबह मेरे साथ खेत चलो। बिना सवाल के।”
खाली खेत, भरा हुआ मन
अगली सुबह सूरज भी ठीक से नहीं निकला था जब हरिशंकर बाबा के साथ चल पड़ा। उनका खेत गाँव के कोने में था — चारों तरफ़ झाड़-झंखाड़, कूड़े का ढेर, टूटी मेंड़ और सूखी मिट्टी।
हरिशंकर ने देखा, खेत ऐसा था मानो वर्षों से किसी ने इसे छुआ तक नहीं।
“यह ज़मीन तेरे जैसी ही है,” बाबा मुस्कराए, “बेजान दिखती है, लेकिन अंदर अभी जान बाकी है।”
हर दिन सूरज की तपिश में वह खेत साफ़ करता, कूड़े उठाता, मेड़ बाँधता, झाड़ियों को काटता। हाथों में छाले पड़ गए, पैर काँपने लगे, लेकिन वह नहीं रुका।
किस्मत की दस्तक
एक दिन बाबा ने कहा, “उस पुराने कुएँ की मिट्टी हटा, शायद फिर से पानी निकले।”
हरिशंकर खुदाई में जुट गया। मिट्टी हटाते हुए उसकी कुदाल किसी धातु से टकराई। पहले तो उसने सोचा, कोई पत्थर होगा। लेकिन खुदाई करते-करते एक पुराना लोहे का संदूक निकला।
हाथ काँपते हुए उसने संदूक खोला — अंदर थे कुछ पुराने चाँदी के सिक्के, एक सोने की अंगूठी, और एक सूखा हुआ कागज़ — जिस पर लिखा था:
“यह धन उस किसान के लिए है जो निस्वार्थ भाव से ज़मीन को जीवन देता है।”
हरिशंकर के होश उड़ गए। वह सोचने लगा — “क्या ये मेरा भाग्य है? क्या सचमुच…?”
बाबा केदार ने पीछे से देखा और मुस्कराते हुए बोले:
“बेटा, तू तो अंधे की तरह खेत को सींच रहा था, और देख… ‘बटेर’ खुद चलकर तेरे हाथ लग गई!”
नया विश्वास, नया बीज
हरिशंकर ने संदूक गाँव की पंचायत को सौंप दिया और प्रस्ताव रखा — “इससे हम स्कूल की मरम्मत करें, बच्चों के लिए मिड-डे मील शुरू करें।”
गाँव वालों की आँखें इस बार क्रोध से नहीं, सम्मान और आश्चर्य से भरी थीं।
यह वही हरिशंकर था जिसने एक समय नकली बीज बेचे थे — लेकिन अब वह असली उम्मीद बो रहा था।
बच्चे उसे “शंकर चाचा” कहने लगे थे। विमला फिर से मुस्कराने लगी, और नन्हे ने एक दिन उसके गले लगकर कहा,
“पापा, आप अब फिर से मेरे हीरो हो।”
सीख:
कभी-कभी जीवन वहाँ से मुस्कुराता है जहाँ से उम्मीद मर चुकी होती है। मेहनत और सच्चाई के साथ जब कोई अपना अंधकार पार करता है, तो किस्मत उसे वो भी देती है जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की थी। यही है —
“अंधे के हाथ बटेर लगना।”
अगली कड़ी का संकेत:
अब हरिशंकर को पंचायत ने स्कूल सुधारने की ज़िम्मेदारी दी है, लेकिन उसके पास संसाधन कम और समस्याएँ बड़ी हैं। जब इरादे बड़े हों और साधन छोटे — तो यही कहते हैं:
“ऊँट के मुँह में जीरा।”
अगली कहानी में जानिए — क्या हरिशंकर फिर उम्मीद बो पाएगा?
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