बीजों का सौदागर | जैसा बोओगे, वैसा काटोगे

बुंदेलखंड के “परसईपुर” नामक गाँव में हरिशंकर नाम का एक किसान रहता था। उम्र लगभग 40 वर्ष की होगी, कंधे पर हमेशा गमछा लटका रहता, और चेहरे से पसीना गिरता रहता — लेकिन उसकी आँखों में अब पहले जैसी चमक नहीं थी। खेती करता था, मगर पाँच सालों से सूखा, कीड़े, और फसल खराबी ने उसके मन को तोड़कर रख दिया था।
हर दिन सूरज की तपिश और पेट की भूख उसके इरादों को निगलती जा रही थी।
एक दिन वह तय करता है कि अब खेती नहीं करेगा। “किस्मत मेरी है ही नहीं किसान बनने की। अब कुछ और करना होगा।” पत्नी विमला और बेटे नन्हे को साथ लेकर किसी नए मौके की तलाश में वह शहर चला गया ।
शहर में उसे किशोरलाल नामक व्यापारी मिला। उसके पास एक बीज की दुकान थी, लेकिन वह असली से ज़्यादा नकली बीज बेचकर मुनाफा कमाता था। किशोरलाल ने हरिशंकर की परेशानी सुनी और बोला:
“अरे तुम तो किसान हो, तुमपर लोगों का भरोसा पहले से है। तुम नकली बीज भी बेचोगे तो लोग बिना पूछे खरीद लेंगे। मैं तुम्हें बीज दूँगा तुम बेचो और मुनाफा आधा-आधा बाँट लेंगे।”
हरिशंकर पहले तो झिझका, लेकिन गरीबी के हाथों मजबूर था। उसने सोचा, “एक बार पैसे कमा लूँ, फिर सब ठीक कर लूँगा। भगवान भी तो उसी की मदद करता है जो खुद की मदद करे।”
हरिशंकर फिर गाँव लौटा। लोगों ने पूछा, “क्यों हरिशंकर, खेती छोड़ दी?”
वह बोला, “नहीं भाई, अब मैं एक नया बीज लाया हूँ। शहर में कहते हैं इससे दोगुनी फसल होती है। थोड़ा महंगा है, लेकिन फायदे का सौदा है।”
गाँव के भोले किसानों ने अपनी जमापूंजी निकाल ली। कुछ ने उधार लेकर बीज खरीदा। हरिशंकर ने अपनी दुकान जमाई और खूब मुनाफा कमाया।
तीन महीने बाद, जब पौधे निकलने का समय आया, खेतों में सूखी पत्तियाँ और जली हुई जमीन दिखी। बीज खराब थे। पूरे गाँव में हाहाकार मच गया। लोग टूट गए, परिवार भूखे सोने लगे। कर्ज़ के पैसे लौटाने का कोई रास्ता नहीं था।
गाँव वालों को सच्चाई का पता चल गया की हरिशंकर ने धोखा दिया था।
उस दिन गाँव की चौपाल में पंचायत बैठी। सरपंच ने कड़े स्वर में कहा:
“हरिशंकर, तूने अपने ही भाइयों को लूटा है। जानते हुए भी खेतों में नकली बीज बोए, अब तू खुद देख तेरे साथ गाँव वालो को भी ये भुगतना पड़ा है।आज पूरी गाँव तुम्हारे ख़िलाफ़ खड़ा है।
याद रख, ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।’
हरिशंकर सिर झुकाए खड़ा था। न उसका कोई साथ देने वाला बचा था, न उसकी आँखों में नींद। वह लौटकर अपने घर गया, जहाँ विमला और बेटा नन्हे भी उसे देखकर कुछ नहीं बोले। घर की दीवारों पर अब सिर्फ़ सन्नाटा था।
रातभर हरिशंकर सो नहीं सका। उसे अपने पुराने दिन याद आए जब उसका खेत भले ही कम फसल देता था, लेकिन मन शांत रहता था। अब पैसा था, पर शांति नहीं।
वह सुबह उठकर गया और गाँव की मंदिर में सबके सामने माफ़ी माँगी। फिर अपना सारा पैसा और सामान गाँव की स्कूल और अनाथ बच्चों को दान कर दिया।
लोगों ने उसे घृणा से देखा, पर कुछ ने सोचा शायद वो बदल गया है।
सीख:
धोखे से कमाया गया धन कभी सुख नहीं देता। ईमानदारी से की गई मेहनत भले कम दे, पर चैन देती है। जो जैसा बोता है, वह वैसा ही काटता है — यही जीवन का मूल नियम है।
हरिशंकर ने सब कुछ खोकर भी कुछ ऐसा पाया, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी — अगली कहानी में जानिए जब “अंधे के हाथ बटेर लगी।”
कहानी अच्छी लगे तो कमेंट में जरूर बतायें
