बुद्धि का झोला | लालच का अंत और सच्चाई की जीत

एक गांव में दो भाई रहते थे — एक का नाम था अमीरलाल, और दूसरे का गरीबलाल
नाम के अनुसार ही दोनों की ज़िंदगी थी। अमीरलाल के पास हर ऐशो-आराम की चीज़ थी,
जबकि गरीबलाल के पास एक छोटी-सी झोपड़ी के अलावा कुछ भी नहीं था।

गरीबलाल रोज जंगल जाकर लकड़ियाँ काटता और उन्हें बेचकर अपने परिवार का गुज़ारा करता था।

🧙‍♂️ पहला वरदान – चमत्कारी सिक्का

एक दिन जब वह जंगल में लकड़ी काट रहा था, तभी उसे एक बाबा जी मिले।
बाबा जी ने पूछा, “बेटा, तुम क्या कर रहे हो?”

गरीबलाल ने कहा, “बाबा जी, मैं बहुत गरीब हूँ। लकड़ियाँ काटता हूँ और बेचकर ही अपना पेट पालता हूँ।”

बाबा जी मुस्कराए और उसे एक चमत्कारी सिक्का दिया और बोले:

“इस सिक्के को हर सुबह नहा-धोकर पूजा करना, फिर इसे दीवार से टकराना।
जितनी बार यह दीवार से टकराएगा, उतने नए सिक्के बनेंगे।
लेकिन ध्यान रखना – लालच मत करना, जितनी ज़रूरत हो उतना ही लेना और बाकी छोड़ देना।”

गरीबलाल को यकीन नहीं हुआ लेकिन घर जाकर वैसा ही किया।
सचमुच, जैसे ही सिक्का दीवार से टकराया, एक नया सिक्का बन गया!
अब वह रोज अपनी ज़रूरत भर के सिक्के बनाता और चैन से जीने लगा।अब उसकी ज़िंदगी पहले से बेहतर हो गई थी। घर में खाने की कमी नहीं रही, पर वह अब भी विनम्र और मेहनती बना रहा।

🤨 अमीरलाल की जासूसी और चालाकी

जब अमीरलाल ने देखा कि गरीबलाल अब जंगल नहीं जा रहा, तो उसे शक हुआ।
उसने अपनी पत्नी को गरीबलाल के घर भेजा। वहाँ से पता चला कि बाबा जी ने उसे चमत्कारी सिक्का दिया है। ये बात अमीरलाल को खटकने लगी।

अमीरलाल ने एक चाल चली। अगले दिन गरीबलाल के पास गया और बोला: “भाई, मेरे घर मेहमान आ गए हैं। ज़रा अपना सिक्का दे दे, मैं ज़रूरत भर ले लूंगा और तुझे लौटा दूंगा।” गरीबलाल ने मना किया, लेकिन बहुत मिन्नतों के बाद सिक्का दे दिया।

अगले दिन जब वह सिक्का वापस माँगने गया, तो अमीरलाल ने उसे डांट दिया और कहा, “कौन-सा सिक्का? तेरे पास कहाँ से आया? दफा हो जा!”

गरीबलाल दुखी मन से लौट आया और फिर से लकड़ी काटने चला गया।

🍽️ दूसरा वरदान – जादुई टेबल

अब गरीबलाल फिर से उसी गरीबी में लौट आया। लेकिन कुछ समय बाद, जंगल में बाबा जी फिर से मिले। उन्होंने सारी बात सुनी और उन्होंने कहा – ये लो एक जादुई टेबल।इस बार एक जादुई टेबल दी।
बाबा जी बोले: “इसे सामने रखकर कहना – ‘टेबल, मुझे यह चाहिए’, तो वह चीज़ तुरंत सामने आ जाएगी।” अब गरीबलाल को खाना पकाने की भी ज़रूरत नहीं थी। जो चाहिए, वह टेबल से माँग लेता।

लेकिन फिर वही कहानी — अमीरलाल की पत्नी आई, सारा राज पता किया और
अमीरलाल ने फिर से झूठ बोलकर टेबल माँग ली।

अगले दिन गरीबलाल जब टेबल माँगने गया, तो फिर से पीटा गया और खाली हाथ लौटा।

🧠 तीसरा वरदान – बुद्धि का झोला

गरीबलाल फिर से हताश हो गया। अब बाबा जी ने तीसरी बार गरीबलाल को देखा और कहा:

“अब तुम्हें बुद्धि चाहिए।” उन्होंने एक बुद्धि का झोला दिया और कहा:

“कमरे में अकेले जाना, दरवाज़ा बंद कर लेना, फिर कहना —
‘हे बुद्धि के झोले महाराज, मुझे बुद्धि दो।’ जब तुम्हें लगे कि बुद्धि आ गई है, तो कहना – ‘हे महाराज, मुझे बुद्धि हो गई।’गरीबलाल झोला लेकर घर आया और वैसा ही किया – दरवाज़ा बंद कर लिया, झोला रखा और बोला –
“हे बुद्धि के झोले महाराज, मुझे बुद्धि दो।” इतना कहना था कि झोले से दो हट्टे-कट्टे लठैत निकले और उन्होंने गरीबलाल की जमकर धुनाई कर दी!
गरीबलाल चिल्लाता रहा, मगर लठैत नहीं रुके। वो सोचने लगा –
“बाबा ने तो बुद्धि दी है, ये पिटाई क्यों हो रही है?”

पिटते-पिटते ही अचानक उसके मन में विचार आया –
“शायद यही असली परीक्षा है… बुद्धि तभी आएगी जब सीख मिलती है।”
तब उसे बाबा की बात याद आई – “जब लगे कि बुद्धि आ गई है, तो कहना – ‘हे महाराज, मुझे बुद्धि हो गई।’”

जैसे ही उसने यह कहा, दोनों लठैत वापस झोले में समा गए।

अब गरीबलाल की आंखें खुल गईं। और अब उसके पास असली समझदारी आ गई।

उसे समझ आ गया कि असली बुद्धि खुद के अनुभव से आती है

अबकी बार उसने तय किया कि यह झोला अमीरलाल को सबक सिखाने के लिए देगा।

उसकी पत्नी अमीरलाल के घर गई और बोली:

“अब हमें बाबा से बुद्धि का झोला मिला है, बहुत ताकतवर है, पर हम किसी को नहीं देंगे।”

यह सुनते ही अमीरलाल बेचैन हो गया और खुद गरीबलाल के पास आया।

फिर वही मिन्नतें, फिर वही झूठी कहानियाँ।

गरीबलाल ने झोला देते हुए कहा:

“कमरे में बंद हो जाना, ताला लगवा लेना, चाबी कुएँ में फेंक देना।
फिर कहना — ‘हे बुद्धि के झोले महाराज, मुझे बुद्धि दो।’ जब बुद्धि आ जाएगी, तो बाहर आ जाओगे।”

अमीरलाल ने वैसा ही किया। जैसे ही उसने कहा —

“हे बुद्धि के झोले महाराज, मुझे बुद्धि दो”
दो लठैत झोले से निकले और मारने लगे।

लेकिन अमीरलाल को नहीं पता था कि पिटाई बंद कैसे होती है!

🧹 गाँव में हड़कंप

उसकी चीखें सुनकर घरवाले दौड़े, फिर गाँव वाले भी आए।
जब दरवाज़ा तोड़ा, तो लठैत सबको मारने लगे।

तब अमीरलाल चिल्लाया — “ये सब गरीबलाल का किया धरा है!”

गरीबलाल बोला:

“पहले मेरा सिक्का और टेबल वापस करो, तभी बताऊंगा।”

अमीरलाल ने सब तुरंत लौटाया। तब गरीबलाल ने कहा:

“अब बोलो — ‘हे महाराज, मुझे बुद्धि हो गई।’”

जैसे ही अमीरलाल ने कहा, लठैत वापस झोले में चले गए।

🎉 निष्कर्ष | सीख

इस तरह गरीबलाल को उसका सब कुछ वापस मिल गया।
और अमीरलाल को सिखाया गया कि लालच का अंत बुरा ही होता है, और सच्चाई की जीत हमेशा होती है।

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