🪔 दिये की आखिरी लौ

स्थान: एक छोटा सा गाँव — जहाँ पुराने रास्ते हैं, मिट्टी की महक है, और कुछ दिलों में अब भी उम्मीद बाकी है। पात्र: • रामू काका – 65 वर्ष के, मिट्टी के दीये बनाने वाले। • आरव – 12 साल का उत्साही बच्चा, जो सब कुछ जानना चाहता है। 🧱 भाग 1: बुझती उम्मीदें…

बूढ़ी अम्मा की आख़िरी चिट्ठी – एक अधूरी कहानी

गाँव के कोने में बनी पुरानी सी ईंटों वाली कोठरी में रहती थीं श्यामा अम्मा। सफेद झक्क बाल, काँपते हुए हाथ, और आँखों में इंतज़ार की नमी। कोई आता-जाता नहीं था, पर उनकी दिनचर्या कभी नहीं बदली। हर सुबह पूजा के बाद वो बैठतीं, एक पेन और पुराना खत निकालतीं — और लिखना शुरू कर…

छोटे शहर की बड़ी कहानी: एक चायवाले की ज़ुबानी

लेखक: Kahaniwala 1. स्टेशन रोड का कोना शहर का नाम भले ही छोटा हो – मधुपुर, लेकिन इसकी हर गली में हज़ार कहानियाँ दबी हुई हैं। स्टेशन रोड पर एक मोड़ है, जहाँ हर सुबह-सुबह एक बूढ़ा आदमी तांबे के केतली में चाय पकाता है। नाम है — बद्री चायवाला। उम्र करीब 65 के पार,…

नहले पर दहला | मेरे दोस्त की सुनाई अनोखी गांव की कहानी

“ये कहानी मेरे दोस्त ने मुझे ऐसे सुनाई थी जैसे वो खुद उसका गवाह हो, और मुझे लगा – इसे आप सबसे ज़रूर शेयर करना चाहिए।”– Ravikesh (Kahaniwala) 🌾 एक आम गांव, एक खास किस्सा कुछ दिन पहले मेरी मुलाक़ात मेरे बचपन के दोस्त अर्जुन से हुई। पुराने दिनों की बातें करते-करते वो एक किस्सा…

बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद

बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद

परसाईपुर गांव में अब बसंती हवा बह रही थी। खेतों में गेहूं की बालियाँ झूम रही थीं और आमों में बौर आ चुके थे। गाँव का हर कोना हरियाली से लहराता था, मगर Harishankar के मन का मौसम थोड़ा भारी था। पिछली बार मंडी में सरसों के सौदे में घाटा हो गया था और गांव…

📖 ज्ञान का चश्मा | गाँव के मास्टरजी बनाम मोबाइल बाबा

  🪔 लोकोक्ति: “घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध” अर्थ: जो व्यक्ति अपने घर या समाज में ज्ञानी होता है, उसकी बातें या सलाहों को अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि बाहर से आए किसी अनजान व्यक्ति को बिना जाँचे परखे ही सिद्ध मान लेते हैं। 👥 प्रमुख पात्र: रामबचन मिश्रा: मधुपुरवा…

आ बैल मुझे मार | हरिशंकर और उसकी ज़िद का अंजाम

लोकक्ति: “आ बैल मुझे मार” जब इंसान बिना सोचे-समझे किसी बड़े से टकरा जाए और अपनी ही ज़िद में खुद को मुश्किल में डाल दे, तो यही कहा जाता है – “आ बैल मुझे मार।” परसाइपुर का ज़िद्दी हरिशंकर बुंदेलखंड के छोटे से गाँव परसाइपुर में हरिशंकर नाम का एक आदमी रहता था। अपने आप…

मुखिया की कुर्सी और चपरासी की इज़्ज़त | ऊँचाई पर बैठने से कोई महान नहीं बनता

लोकोक्ति: “ऊँचाई पर बैठने से कोई महान नहीं बनता”अर्थ: केवल ऊँचे पद या रुतबे पर बैठना किसी को महान नहीं बनाता। असली महानता उसके व्यवहार, कर्म और सोच से जानी जाती है। 1. कहानी की शुरुआत – गाँव बकुलीपुर का चुनाव उत्तर प्रदेश के बकुलीपुर गाँव में सरपंच चुनाव होने वाले थे। पूरा गाँव चुनावी…

बुद्धि का झोला | लालच का अंत और सच्चाई की जीत

एक गांव में दो भाई रहते थे — एक का नाम था अमीरलाल, और दूसरे का गरीबलाल।नाम के अनुसार ही दोनों की ज़िंदगी थी। अमीरलाल के पास हर ऐशो-आराम की चीज़ थी,जबकि गरीबलाल के पास एक छोटी-सी झोपड़ी के अलावा कुछ भी नहीं था। गरीबलाल रोज जंगल जाकर लकड़ियाँ काटता और उन्हें बेचकर अपने परिवार…

नालायक प्रमोद और रमेश की मेहनत | “नाच न आवे आँगन टेढ़ा”

परिचय – दो दोस्तों की दो राहें जब काम नहीं आता, तो लोग बहाने बनाते हैं… और मेहनती की पहचान कभी नहीं छुपती! सीतापुर एक छोटा लेकिन आत्मसम्मान से भरा गाँव था। इसी गाँव में रहते थे दो बचपन के दोस्त – रमेश और प्रमोद। दोनों एक ही स्कूल में पढ़े, एक ही गलियों में…