आ बैल मुझे मार | हरिशंकर और उसकी ज़िद का अंजाम

लोकक्ति: “आ बैल मुझे मार”

जब इंसान बिना सोचे-समझे किसी बड़े से टकरा जाए और अपनी ही ज़िद में खुद को मुश्किल में डाल दे, तो यही कहा जाता है – “आ बैल मुझे मार।”

परसाइपुर का ज़िद्दी हरिशंकर

बुंदेलखंड के छोटे से गाँव परसाइपुर में हरिशंकर नाम का एक आदमी रहता था। अपने आप को बहुत चालाक और बहादुर समझता था। हर काम में दूसरों को सलाह देना, बिना मांगे राय देना और सबसे बड़ी बात — बिना सोचे फैसला कर लेना, यही उसका स्वभाव था।

एक दिन गाँव के चौपाल में बैठकर वह अपने दोस्तों से बोला, “इस बार मैं ऐसी दुकान खोलूँगा कि गाँव के सारे ग्राहक मेरे पास ही आएँगे। वो जमादार भैरव का तो बिज़नेस मैं बंद करवा दूँगा।”

सभी लोग हक्के-बक्के रह गए। भैरव गाँव का सबसे पुराना और अमीर व्यापारी था, जिसकी किराने की दुकान पूरे परसाइपुर में मशहूर थी। कोई उससे भिड़ने की सोच भी नहीं सकता था।

ज़िद की शुरुआत

हरिशंकर ने भैरव की दुकान के ठीक सामने एक छोटी सी झोपड़ी बनवा ली और वहीं दुकान खोल दी। ना तो ठीक से माल था, ना तजुर्बा, ना ही ग्राहक सेवा का सलीका। लेकिन हरिशंकर को लगा कि लोग “नई दुकान” देखकर खुद-ब-खुद खिंचे चले आएँगे।

गाँव वालों ने बहुत समझाया, “हरिशंकर भैया, थोड़ा सोच समझकर कदम उठाओ। भैरव से पंगा मत लो। उस पर पूरा गाँव भरोसा करता है।”

लेकिन हरिशंकर हँसते हुए बोला, “अरे जब शेर आता है तो सियार भागते हैं। भैरव का टाइम गया, अब मेरा टाइम है।”

पहला झटका

दुकान खोले अभी हफ्ता भी नहीं बीता था कि उसे पहला झटका लग गया। उसके पास जो सामान था, वह या तो घटिया क्वालिटी का निकला या महँगा। गाँव वालों ने वापस मुड़कर देखना भी बंद कर दिया।

कर्ज़ा लेकर जो माल लाया था, वह धूल खाने लगा। कर्ज़ देने वाले तगादा करने लगे, लेकिन हरिशंकर की ज़िद अब भी कम न हुई।

भैरव की चाल

भैरव को जब पता चला कि हरिशंकर उससे पंगा लेने आया है, तो उसने भी चाल चली। उसने अपने ग्राहकों को दाम में छूट देनी शुरू कर दी और कुछ दिनों तक मुफ्त नमक और माचिस बाँटना शुरू कर दिया।

गाँव वाले फिर से उसकी दुकान की तरफ भागने लगे। हरिशंकर की दुकान वीरान होती गई।

हरिशंकर का अहंकार

कई बार गाँव के समझदार बुज़ुर्गों ने उसे बुलाकर कहा, “बेटा, नुकसान से पहले पीछे हटना समझदारी है। झुक जाओ, यही वक़्त है।”

लेकिन वह अकड़कर कहता, “मैं पीछे हटने वालों में नहीं, हार मानने वालों में नहीं। मैं दिखाऊँगा कैसे लड़ते हैं।”

नुकसान पर नुकसान

कुछ ही महीनों में हरिशंकर का सब कुछ बिक गया। भैंस, खेत, यहाँ तक कि घर भी गिरवी रख देना पड़ा। लेकिन दुकान नहीं छोड़ी।

एक दिन दुकान में बैठा-बैठा अकेला सोच रहा था — “मैंने क्या किया? किससे टकरा गया?” और उसी समय उसे अपने पिताजी की कही एक बात याद आई —

“बिना कारण सींग उठाना बैल को न्यौता देना है — बेटा, आ बैल मुझे मार।”

समझदारी की रोशनी

अगली सुबह हरिशंकर ने दुकान बंद की और सीधा भैरव के पास गया। हाथ जोड़कर बोला, “भैया, गलती हो गई। आप बड़े हैं, मुझे माफ़ कर दीजिए।”

भैरव हँसा और बोला, “समझ आ गया ना? चलो, अब मेरे यहाँ काम शुरू करो। सीखो पहले, फिर सोचो कुछ करने का।”

अंत में सबक

हरिशंकर ने झुकना सीखा। आज वह भैरव की दुकान में बतौर सहायक काम करता है। धीरे-धीरे वह व्यापार के गुर सीख रहा है और अब वह अपने अनुभव से बड़ा बनना चाहता है, ना कि ज़िद से।

कहानी से सीख:

  • ज़िद और अहंकार के कारण हम अक्सर मुसीबत को खुद ही बुला लेते हैं।
  • किसी से टकराने से पहले उसकी ताक़त और अपनी सीमा को पहचानना ज़रूरी है।
  • समझदारी, धैर्य और सीखने की चाह ही हमें असली सफलता दिलाती है।

लोकक्ति की सार्थकता: “आ बैल मुझे मार” — यह कहावत हरिशंकर की कहानी में पूरी तरह फिट बैठती है।

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