मुखिया की कुर्सी और चपरासी की इज़्ज़त | ऊँचाई पर बैठने से कोई महान नहीं बनता

लोकोक्ति: “ऊँचाई पर बैठने से कोई महान नहीं बनता”
अर्थ: केवल ऊँचे पद या रुतबे पर बैठना किसी को महान नहीं बनाता। असली महानता उसके व्यवहार, कर्म और सोच से जानी जाती है।
1. कहानी की शुरुआत – गाँव बकुलीपुर का चुनाव
उत्तर प्रदेश के बकुलीपुर गाँव में सरपंच चुनाव होने वाले थे। पूरा गाँव चुनावी माहौल में डूबा था। चाय की दुकानों से लेकर चौपालों तक एक ही चर्चा – “अबकी बार कौन बनेगा मुखिया?”
इस बार का सबसे चर्चित नाम था – धनेश्वर यादव। पढ़ा-लिखा लड़का था, शहर से लौटा था, और लोगों से अच्छे वादे कर रहा था – सड़क, नाली, स्कूल, खेती। गाँव के लोग सोचने लगे – चलो इस बार इसे ही आजमाते हैं।
धनेश्वर जीत गया। और अब वो था – मुखिया जी!
2. कुर्सी की ऊँचाई और बदलाव की शुरुआत
धनेश्वर ने कुर्सी संभालते ही पंचायत भवन की चमक-दमक बढ़ा दी। लेकिन धीरे-धीरे उसका व्यवहार बदलने लगा।
- बुज़ुर्गों से तेज़ आवाज़ में बात करता।
- गरीबों की बात अनसुनी करता।
- सिर्फ खास लोगों को मिलने देता।
गाँव के लोग धीरे-धीरे बुदबुदाने लगे – “भैया अब मुखिया नहीं, राजा बन गए हैं!”
3. रामसनेही काका – बुज़ुर्ग चपरासी की सादगी
पंचायत में एक बुज़ुर्ग चपरासी थे – रामसनेही काका। 65 की उम्र, लेकिन समय के पाबंद और व्यवहार में नम्र।
- हर दिन समय पर आते।
- सबसे “प्रणाम काका” सुनते और सबको “बाबू” कहकर बुलाते।
गाँव का हर बच्चा, हर बुज़ुर्ग उन्हें जानता और मानता था।
“बबुआ, पद से नहीं, सेवा से इज़्ज़त मिलती है।” – रामसनेही काका
4. जब गाँव में आया बड़ा अफसर
जिले के जिला विकास अधिकारी (DDO) का दौरा तय हुआ। पंचायत भवन सजाया गया। मुखिया तैयार।
लेकिन जैसे ही अधिकारी पहुँचे, उन्होंने सबसे पहले रामसनेही काका के पैर छुए और बोले:
“इनके जैसे लोग असली बड़े होते हैं – कर्म और सेवा से।”
धनेश्वर अवाक। पूरा गाँव सन्न।
5. असली महानता की पहचान
DDO साहब ने सभा में कहा:
“हम पद से नहीं, अपने व्यवहार और सेवा से बड़े बनते हैं।”
तालियाँ गूंज उठीं। धनेश्वर को समझ आ गया कि असली greatness कुर्सी से नहीं, सोच से आती है।
6. धनेश्वर का बदलाव और गाँव का सम्मान
अब मुखिया धनेश्वर पूरी तरह बदल चुका था:
- बुज़ुर्गों से झुक कर बात करता,
- हर फरियादी को ध्यान से सुनता,
- रामसनेही काका को पंचायत सलाहकार बना दिया।
अब बकुलीपुर सिर्फ सड़क और नाली नहीं, संस्कार और आदर के लिए भी जाना जाने लगा।
7. कहानी की सीख (Moral of the Story)
“ऊँचाई पर बैठने से कोई महान नहीं बनता”
Greatness ना तो कुर्सी देती है, ना ही पद।
असली इज़्ज़त मिलती है – व्यवहार, सेवा और संस्कार से।
❤️ आपका क्या मानना है?
क्या आपने कभी ऐसा अनुभव किया है जहाँ किसी ने पद का घमंड दिखाया हो?
या किसी सादगीपूर्ण इंसान से असली greatness देखी हो?
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