नालायक प्रमोद और रमेश की मेहनत | “नाच न आवे आँगन टेढ़ा”

परिचय – दो दोस्तों की दो राहें

जब काम नहीं आता, तो लोग बहाने बनाते हैं… और मेहनती की पहचान कभी नहीं छुपती!

सीतापुर एक छोटा लेकिन आत्मसम्मान से भरा गाँव था। इसी गाँव में रहते थे दो बचपन के दोस्त – रमेश और प्रमोद। दोनों एक ही स्कूल में पढ़े, एक ही गलियों में खेले, लेकिन उम्र बढ़ते-बढ़ते उनकी सोच अलग हो गई।

रमेश – शांत, मेहनती और ज़मीन से जुड़ा हुआ इंसान। प्रमोद – चालाक, दिखावे का शौकीन और दूसरों की मेहनत पर अपनी मोहर लगाने वाला।

रमेश का सपना – बच्चों के लिए पाठशाला

गाँव के सरकारी स्कूल में अब न शिक्षक थे, न शिक्षा। रमेश को बच्चों की हालत देखकर दुख होता। उसने तय किया कि कुछ करना होगा। उसने अपने पुराने घर को पढ़ाई के लिए तैयार किया।

दीवारों पर चार्ट्स लगाए पुरानी बेंचें मंगवाई खुद बच्चों के लिए किताबें और स्लेट खरीदीं

अब रोज़ शाम को खेत से लौटकर बच्चों को पढ़ाता। उसकी मेहनत रंग लाई — बच्चे आने लगे, सीखने लगे और हँसने लगे।

प्रमोद की चालाकी – फेसबुक वाला समाजसेवक

जब गाँववालों ने रमेश की तारीफ करनी शुरू की, तो प्रमोद को जलन होने लगी। वो सोचने लगा —

“नाम तो मुझे मिलना चाहिए था!”

एक दिन वह भी बच्चों के बीच पहुँचा, कुछ फोटो खिंचवाईं और सोशल मीडिया पर पोस्ट डाल दी –

“सीतापुर में फ्री शिक्षा शुरू की, अब बच्चों का भविष्य चमकेगा!”

गाँववालों को सच्चाई पता थी, पर रमेश चुप रहा। उसके लिए काम ज़्यादा ज़रूरी था, नाम नहीं।

पंचायत का फैसला – प्रमोद को ज़िम्मेदारी

पंचायत ने इस कार्य को और बड़ा करने का सोचा। उन्होंने प्रमोद को कहा –

“अब से हर रविवार ‘ज्ञान कक्षा’ तुम संभालो।”

प्रमोद खुश हुआ। सोचा, “अब तो मैं हीरो बन जाऊँगा!” लेकिन असल परेशानी अब शुरू हुई — उसे न तो पढ़ाना आता था, न बच्चों को संभालना। ना तैयारी, ना योजना।

पहला रविवार – पोल खुल गई

रविवार को बच्चे आए तो देखा – कोई किताब नहीं, न बोर्ड, न खेल का सामान। प्रमोद ने कहा,

“आज बातें करेंगे।”

बच्चे बोर हो गए। धीरे-धीरे सब उठकर चले गए।

शाम को पंचायत ने पूछा –

“क्या हुआ प्रमोद जी?”

तो प्रमोद बोला –

“आँगन ही टेढ़ा है साहब, कोई साथ नहीं देता।”

बुज़ुर्ग की सीख – असली कहावत

तभी वहाँ बैठे एक बुज़ुर्ग मुस्कराते हुए बोले –

“बेटा, जब किसी को नाचना नहीं आता तो वो कहता है – आँगन टेढ़ा है। लेकिन यहाँ तो आँगन भी सीधा था और ताल भी ठीक। नाचना तुम्हें नहीं आता।”

पूरा गाँव समझ गया कि प्रमोद सिर्फ दिखावा करता है और असली मेहनत रमेश की है।

अंत – मेहनत की जीत

पंचायत ने रमेश को ही आगे की जिम्मेदारी सौंप दी। आज वह स्कूल पूरे गाँव के बच्चों के भविष्य का दीपक बन चुका है। लोग अब उस जगह को “रमेश पाठशाला” कहते हैं।

और प्रमोद?

वो अब भी कभी-कभी फेसबुक पर लिख देता है –

“कुछ बड़ा करने वाला हूँ… इंतज़ार कीजिए!”

कहानी की सीख:

जो काम नहीं कर सकता, वह बहाने बनाता है।

और जो दिल से काम करता है, उसे पहचान की ज़रूरत नहीं पड़ती — पहचान खुद उसके पीछे चलती है।

“नाच न आवे, आँगन टेढ़ा” – इस कहावत की सच्चाई को याद रखिए।

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